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Transformer Kya hai

ट्रॉन्सफार्मर (Transformer) किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार के होते हैं? समझाइये?

उत्तर: ट्रॉन्सफार्मर (Transformer) : यह एक ऐसा उपकरण होता है। जो प्रत्यावर्ती वोल्टेज को बिना विद्युत ऊर्जा नष्ट किये परिवर्तित कर देता है। अर्थात प्रत्यावर्ती वोल्टेज बड़ा देता है या घटा देता है। यह अन्योन्य प्रेरण के सिद्धांत पर आधारित है।

इसकी व्याख्या सर्वप्रथम फैराडे ने की थी ! ट्रॉन्सफार्मर दो प्रकार के होते है।

  1. अपचायी ट्रांसफार्मर : यह ट्रांसफार्मर प्रत्यावर्ती वोल्टे को घटा देता है।
  2. उच्चायी ट्रांसफार्मर: यह ट्रांसफार्मर प्रत्यावर्ती बोल्टे’ को बडा देता है।

ट्रांसफार्मर (Transformer) में किन-किन कारणों से ऊर्जा क्षय होता हैं?

Transformer Kise Kahate Hain : ट्रांसफार्मर में सद्धांतिक रूप से ऊर्जा का क्षय नहीं होती है। लेकिन व्यवहारिक रूप से कुछ न कुछ ऊर्जा का क्षय होती है।

यह क्षय निम्नानुसार होती रहती है।

1.ताम्र क्षय : ट्रांसफार्मर की प्राथमिक एवं द्वितीयक कुण्डलियों से विद्युत धारा प्रवाहित होने पर उसमें ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है। ऊष्मा के रूप में ऊर्जा की इस क्षय को क्षय कहती है। प्राथमिक एक द्वितीयक कुण्डलियो मे ताँबे के मोटे तारों का उपयो करके इस क्षय को कम किया जा सकता है।

2. लौह हानि : कोड़ मे भवर धाराये उत्पन्न होने के कारण होने वाली ऊर्जा हानि को लौह हानि कहते है। इस हानि के मान को कम करने के लिए क्रोड को पटिलित बनाया जाता है।

  1. English में अपना परिचय कैसे दें?

चुम्बकीय फ्लक्स रक्षण : प्राथमिक कुन्डली मे धारा प्रवाहित करने पर उत्पन्न चुम्बकीय फलक्स द्वितीयक कुण्डली से बद्ध नहीं हो पाता ! अतः कुछ का क्षय हो जाती है। इस क्षय को चुम्बकीय फ्लक्स रक्षण कहते हैं। इसे कम करने के लिए प्राथमिकू कुण्डली के ऊपर द्वितीयक कुण्डली के तार को लपेटा जाता है।

शैथिल्य हानि : प्राथमिक कुण्डली में धारा प्रवाहित करने पर कोड़ बार-बार चुम्बकित और विचुम्बकित होता रहता है। जिससे कुछ ऊजी की हानि हो जाती है। इस हानि को शैथिल्य हानि कहते है। इसे कम करने के लिए नर्म लोहे का क्रोड उपयोग में लाते हैं।

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अपचायी और उच्चायी ट्रान्सफार्मर में अन्तर समझाइये ?

अपचायी ट्रॉन्सफार्मरउच्चायी ट्रासफार्मर
यह ट्रांसफार्मर प्रत्यावर्ती विभवान्तर को घटा देता है।यह ट्रांसफार्मर प्रत्यावर्ती विभवान्तर को बड़ा देता है।
इसकी द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या प्राथमिक कुंडली से कम होती है।इसमें द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या प्राथमिक कुण्डली से अधिक होती है।
इसका परिणमन अनुपात 1 से कम होता है।इसका परिणमन अनुपात 1 से अधिक होता है।
यह धारा की प्रबलता को बड़ा देता हैयह धारा की प्रबलता (राण यह धारा की को घटा देता है

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